देवनागरी लिपि का विकास

देवनागरी लिपि का उद्भाव कब हुआ, यह लम्बे समय तक विवाद का विषय रहा| यूरोपीय विद्वान वूलर, मेक्समूलर, बर्नेल आदि तीसरी – चौथी शताब्दी ई. पू. से पीछे जाने को तैयार न थे | पहली बार गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने ‘प्राचीन भारतीय लिपि माला’ में भारत में लिपि ज्ञान की प्राचीनता सिद्ध की | अब तो यह सिद्ध हो गया है कि ई. पू. 4000 वर्ष पहले भी भारत में सैन्धव लिपि प्रचलित थी | वास्तव में सैन्धव लिपि विश्व की प्रन्चिनतम ज्ञात लिपि है | अनेक विद्वान जैसे राजबली पाण्डेय, सुनीतिकुमार चटर्जी, उदयनारायण तिवारी आदि मानते है की सैन्धव लिपि से ही ब्राही लिपि का विकास हुआ जो समस्त उत्तरभारत की लिपियों का आधार है | ई. पू. पाँचवी शताब्दी से 350 ई. तक भारत में ब्राही लिपि का ही प्रयोग होता था | ब्राही लिपि से क्रमशः गुप्त लिपि ( पाँचवी शताब्दी तक), कुटिल लिपि (छठी से नौवीं शताब्दी तक) तथा प्राचीन नागरी लिपि (बारहवी शताब्दी तक) का विकास हुआ | गुप्त राजाओं के काल में प्रयुक्त होने के कारण यह गुप्त लिपि कहलाती थी | इसी प्रकार, अक्षरों की आकृति अधिक वक्र होने के कारण इसे कुटिल  लिपि कहा गया | कुटिल लिपि से प्राचीन नागरी के चार रूप विकसित हुए – अर्धनागरी, पूर्वीनागरी, नन्दिनागरी तथा सामान्य नागरी | देवनागरी का सम्बन्ध सामान्य नागरी से स्वीकार किया जाता है | कैथी, बंगला, उड़िया, मैथिली, असमिया, राजस्थानी, महाराष्ट्री, महाजनी, गुजराती आदि लिपियाँ भी प्राचीन नागरी के विभिन्न रूपों से विकसित है |

 

मूल शब्द देवनागरी लिपि

Views (8)